यूपी में सात विधानसभाओं पर उप चुनाव हुए। तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में जीत-हार के समीकरणों पर तीखी बहस जारी है। कई लोग इस चुनाव को आने वाले 2022 के चुनावों का सेमी फाइनल करार दे रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि कांग्रेस के संगठन की ताकत साफ साफ दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस उपचुनाव का परिणाम कई राजनीतिक संदेशों को लेकर आएगा।

कांग्रेस का पूरा संगठन रणनीति बनाकर इस उपचुनाव में हर सीट पर लगा हुआ था। प्रियंका गांधी ने हर सीट पर अपना प्रभारी लगा रखा था। हर सीट पर करीब 250 लोगों की केंद्रीय टीम मजबूती से प्रचार अभियान में लगी थी। हर सीट पर विभाग और फ्रंटल के प्रतिनिधियों को जाति के हिसाब से जिम्मेदारी दी गयी थी। सिर्फ इतना ही नहीं, हर सीट पर नेताओं में अपनी प्रतिस्पर्धा और आपसी को खुन्नस भुलाकर एकसाथ मिलकर काम किया गया। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण घाटमपुर में दिखा जब एक दूसरे के विरोधी बताए जाने वाले राकेश सचान और राजाराम पाल साथ साथ दिखे।

बांगरमऊ, घाटमपुर और बुलंदशहर: जीत-हार के समीकरण में कांग्रेस का बोलबाला

यूपी में नौगांवा (अमरोहा), बुलंदशहर,
टुंडला( फिरोजाबाद), घाटमपुर (कानपुर), बांगरमऊ(उन्नाव), मल्हनी (जौनपुर), देवरिया सीटों पर 3 नवंबर को उपचुनाव हुआ। टुंडला में कांग्रेस का पर्चा खारिज हो गया। इन सात सीटों पर कांग्रेस बांगरमऊ, घाटमपुर और बुलंदशहर में मजबूती से लड़ी बल्कि बांगरमऊ से आरती बाजपेयी, घाटमपुर से कृपाशंकर शंखवार और बुलंदशहर से सुशील चौधरी जीत हार के समीकरण के मुख्य किरदार बन बैठे हैं।

प्रियंका के महासचिव बनने के बाद कांग्रेस का ग्राफ लगातार बढ़ा

प्रियंका के महासचिव बनने के बाद कांग्रेस का ग्राफ लगातार बढ़ा है। पिछले उपचुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत 6.2 से बढ़कर दोगुना हो गया था। जानकारों का कहना है कि इस बार वोटिंग प्रतिशत मे तीन गुना वृद्धि का आसार साफ साफ दिख रहा है। यानी कांग्रेस अपने खोये हुए आधार को तेजी के साथ कवर कर रही है।

संघर्ष और आंदोलनों का असर चुनाव पर साफ साफ दिखा

पिछले एक साल में एक राजनीतिक पार्टी के बतौर कांग्रेस ने सड़कों पर विपक्ष की भूमिका बखूबी अदा की है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ मुजफ्फरनगर से आज़मगढ़ तक महासचिव प्रियंका गांधी सड़कों पर नज़र आईं। सोनभद्र के उम्भा कांड के समय चुनार किले में नजरबंद महासचिव प्रियंका गांधी शायद ही यूपी के किसी मसले पर चुप बैठीं हों। हाथरस की बेटी के इंसाफ के लिए दो दिन तक सड़कों पर लड़ती दिखीं।

इन आंदोलनों में कांग्रेस की सक्रियता पर राजनीतिक धुरंधरों की टिप्पणी यह थी कि कांग्रेस लड़ तो रही है लेकिन क्या यह मुद्दे चुनावी राजनीति में वोटरों को लुभा पाएंगे। लेकिन अभी फिलहाल के रुझानों से साफ हो गया है कि सड़क की ताकत वोट में तब्दील हो रही है।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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