कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को मीडिया को संबोधित करते हुए घोषणा  की कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो उनकी पार्टी गरीबों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी लागू करेगी।  2019 के चुनाव के लिए एक मेगा गेम-चेंजर माना जा रहा है ।

इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि भारत ने पिछले सात दशकों में करोड़ों नागरिकों को गरीबी से ऊपर उठाने में उल्लेखनीय प्रगति की है आज औसतन भारतीय परिवार की आय ५०,००० रुपये है, जो १९३८ की औसत आय से २,००० गुना अधिक है |

फिर भी यह आंकड़ा जितना बखान करता है, उससे कही अधिक बात छुपाता है| देश में १०% परिवार आज भी ऐसे है, जिनकी मासिक आय मात्रा ५००० रुपये महीना है| दुसरे शब्दों में कहा जाए तो देश में २.५ करोड़ परिवार ऐसे है, जिनकी आय औसत भारतीय परिवार की आय का १० वा भाग भी नहीं है, वही ५ करोड़ परिवार इसका पांचवा भाग भी नहीं कमा पाते |

 

यह विचार कि समाज में स्वाभिमान के लिए एक निश्चित न्यूनतम आधार होना चाहिए, एक नया विचार नहीं है। यह 18 वीं शताब्दी के विचारकों जैसे कि थॉमस पाइन और जॉन स्टुअर्ट मिल के पास है। समकालीन इतिहास के दौरान, अधिकांश प्रमुख लोकतंत्रों ने अपने नागरिकों के लिए भोजन, रहने, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के कल्याण कार्यक्रमों के माध्यम से अपने सामाजिक अनुबंधों को निष्पादित किया है। यह दुनिया भर में करोड़ों गरीबों के लिए एक निश्चित न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने में शानदार रूप से सफल रहा है।

 

न्यूनतम आय गारंटी एक नए सामाजिक अनुबंध के लिए एक ऐसा विचार है। एक सामाजिक अनुबंध जो नागरिकों को पसंद की स्वतंत्रता के साथ सशक्त करेगा। एक सामाजिक अनुबंध जो प्रत्येक गरीब परिवार को एक न्यूनतम न्यूनतम नकद आय का आश्वासन देगा और उन्हें अपना जीवन जीने की स्वतंत्रता देगा। न्यूनतम आय गारंटी के कांग्रेस अध्यक्ष के विचार को नए सामाजिक अनुबंध की आवश्यकता के इस बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

 

इस योजना पर राष्ट्रीय राजधानी के पावर कॉरिडोर में चिंतन किया जा रहा था |  2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के बाद विषय और विशेषज्ञ आगामी बजट में रोल-आउट की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन वर्तमान सरकार आर्थिक रूप से कोई सफल कदम उठाने में लगभग विफल साबित हुई है |

 

न्यूज 18  द्वारा पहले यह बात प्रकाशित की गयी थी कि  हिंदी हार्टलैंड में तीन महत्वपूर्ण राज्यों में हार और दूसरी तरफ वर्तमान कृषि संकट पर क्रोध से बीजेपी को अपने अंतरिम बजट में यूनिवर्सल बेसिक इनकम की घोषणा करने की संभावना थी। लेकिन वर्तमान सरकार के पास समाज के सबसे गरीब तबके के लिए उपाय करने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी।

 

राहुल गाँधी ने यह घोषणा २०१९ चुनाव के कुछ महीने पहले करके, यह साबित कर दिया, की वे महाराज अग्रसेन द्वारा देखे गए सामाजिक न्याय के सपने को साकार करने की ओर कदम बढ़ाया है | उनकी घोषणा यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) की दिशा में सही है जो 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लिखित  है |

देश में प्रतिवर्ष १२. ८  मिलियन युवा लेबर फ़ोर्स का हिस्सा बन रहे है, लेकिन सी एम आई इ द्वारा २०१८ में बेरोजगारी के जारी आंकड़े बहुत ही भयावह है | अकेले २०१८ में ही ११ मिलियन लोगो की नौकरिया चली गयी |

 

असमानता के लिए, फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी और लुकास चैनसेल ने अपने 2017 के अध्ययन, भारतीय आय असमानता, 1922-2015: ब्रिटिश राज से अरबपति राज तक?  में दिखाया है कि ब्रिटिश राज के बाद से भारत अब किसी भी समय की तुलना में अधिक असमान है और शीर्ष 1 प्रतिशत कमाई करने वाले कुल आय की  22 प्रतिशत पर कब्जा करते हैं।

 

ऑक्सफ़ैम इंटरनेशनल की नवीनतम रिपोर्ट कहती है, 136 मिलियन भारतीय, जो देश के सबसे गरीब 10 प्रतिशत को बनाते हैं, पिछले 15 वर्षों से कर्ज में बने हुए हैं, वही दूसरी ओर सिर्फ २०१८ में ही देश के ११९ अरबपतियों की आय रोजाना २,२०० करोड़ प्रतिदिन के हिसाब से बड़ी है | ऑक्सफेम के कार्यकारी निदेशक ने इसे भयावह बताया और कहा कि शीर्ष 1 प्रतिशत और शेष भारत के बीच यह असमानता यदि जारी रहती है तो यह इस देश की सामाजिक और लोकतांत्रिक संरचना का पूर्ण पतन होगा।

राहुल गांधी अपने भाषणों में समाज में इस असमानता के बारे में बताते रहे हैं, और राजनीतिक पंडितों ने पहले ही अनुमान लगाया है कि वे इस असमानता को ख़त्म करने की दिशा में काम करेंगे|

 

न्यूनतम आय गारंटी क्या है?

 

विकासशील देशों में, बिना शर्त प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण योजना को गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के रूप में देखा जाता है। नकद राशि सीधे लाभार्थियों के u2019 बैंक खाते में जमा की जाती है। लाभार्थियों को, अधिकतम, लाभ प्राप्त करने के लिए केवल बैंक खाता होना चाहिए और निवास प्रमाण दिखाना होगा।

 

चूंकि यह गरीबी उन्मूलन का एक उपाय है, इसलिए भारत में न्यूनतम आय की गारंटी सार्वभौमिक नहीं होगी, यानी सभी को प्रदान की जाएगी। यदि इसे लागू किया जाता है, तो निम्न आय समूह (एलआईजी) लाभार्थी होने की संभावना है।

 

न्यायकामल्टीप्लायर इफेक्ट

अगर मांग को बढ़ाने के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपये अर्थव्यवस्था में झोंके जाते हैं, तो इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था में कई दिशाओं में कई तरीकों से पड़ेगा. गरीब और ज्यादा खाद्य, दूध, दवा, टॉर्च, बैटरी, कपड़े, फोन और दूसरी चीजें खरीदेंगे, जो अभी वे नहीं खरीद पाते. अपने घरों की मरम्मत, सीमेंट की खरीद, पेंट और टाइल्स खरीदने पर वे और ज्यादा खर्च कर सकते हैं. शायद वे अपने बच्चों की शिक्षा, उन्हें स्थानीय अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजने पर ज्यादा खर्च करें| रोजगार में रहने वाले लोग वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करेंगे, कार और मकान खरीदने के लिए लोन लेंगे और अपनी आमदनी का एक हिस्सा निवेश भी करेंगे |  जब बाजार में धन का प्रवाह होगा और बैंकों में ज्यादा कारोबार होगा तो रीयल इस्टेट और ऑटो सेक्टर का पुनरुद्धार होगा और वित्तीय सेक्टर में नयी जान आएगी. यह देखते हुए कि अभी इन क्षेत्रों में अधिकतम क्षमता से बहुत कम काम हो रहा है | कीमत बढ़ने के बजाए कीमत गिर सकती है |

 

कुल मिलाकर ‘न्याय’ के ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ का नतीजा ये हो सकता है कि जीडीपी के विकास की दर दोहरे अंक में पहुंच जाएगी. अगर मुद्रास्फीति 5 फीसदी बढ़ती है और वास्तविक जीडीपी 10 फीसदी बढ़ जाती है, तो सामान्य जीडीपी अगले वित्त वर्ष में अनुमानित 210 लाख करोड़ के बजाए 217 लाख करोड़ होगी. समान टैक्स/जीडीपी अनुपात के रहते हुए करों से सरकार की आय 53 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ जाएगी|



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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