रूसी राजदूत की हत्या बेहद ही निंदनीय है। पर दूसरी नज़र से सोचिये- ये हत्या एक साज़िश भी नज़र आती है। क्योंकि अलेप्पो में हो रहे नरसंहार की वजह से रूस की किरकिरी भी हो रही थी। इतिहास उठाईये- इज़राईल और उसके सहयोगी देश, जिस देश को निशाने में लेना चाहते हैं। पहले वहां जंग की वजह पैदा करते हैं, किसी भी राजनीतिक संकट को आतंकवाद से जोड़ देते हैं, फिर शुरू होती है उस देश के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय साज़िशें। फिर उसे अफगानिस्तान, ईराक़ , सीरिया बना दिया जाता है। चंद आतंकवादियों को पकड़ने और मारने की जगह बमों की बारिश करके नए आतंकवादियों को पैदा कर दिया जाता है। फिर शुरू होती है उस देश की बर्बादी की दास्तान, पूरे के पूरे देश को खण्डहर बना दिया जाता है। उस देश के मारे जाने वाले हज़ारों बेगुनाह नागरिक और बच्चे बिलकुल भी दया के पात्र नहीं होते, जो मानवाधिकार संगठन, देश और लेखक उन मासूमों की मौत के खिलाफ आवाज़ उठाये, उसे आतंकवाद का समर्थक घोषित कर दिया जाता है। फ़िलहाल तुर्की में रूस के राजदूत की हत्या एक साज़िश का शक़ पैदा करती है। तैयब उरदोगोन का तुर्की वर्ल्ड बैंक के क़र्ज़ से 100 प्रतिशत मुक्त है। कमाल पाशा का तुर्की इनका गुलाम था, तैयब ऑर्डोगोन का तुर्की इनका गुलाम नहीं। पहली बार तुर्की,मिस्र और सऊदी अरब एक पटरी पर चल रहे हैं। इन्ही तीनों देश ने मिलकर आइसिस जैसे खूंखार आतंकी संगठन के विरुद्ध 32 देशों की सयुंक्त सेना तैयार की और सीरिया और ईराक़ से आईसिस को उखाड़ फेकने में अहम भूमिका निभाई। सऊदी, तुर्की और मिस्र के नेतृत्व में लड़ रही सयुंक्त सेना को सीरिया में रूस और फ्रांस का दखल मंज़ूर नहीं था। रूस की बमबारी के निशाने में आतंकवादी कम और रूस के आम नागरिक ज़्यादा मारे जाने की ख़बरें मीडिया के ज़रिये पता चली हैं।
फिलहाल देखना ये है, कि क्या रूस और तुर्की के बीच बने तनावपूर्ण हालात एक और नई जंग का इशारा कर रहे हैं। क्योंकि ये एक सिलसिला बन गया है, एक जंग ख़त्म- एक देश तबाह। फिर अगली जंग शुरू और अगला देश तबाह कर दिया जाता है। सोशलमीडिया में लोग अपनी प्रतिक्रिया देते हुए, इसे तीसरे विश्वयुद्ध की आहट भी करार दे रहे हैं। जो की विश्व शांति के लिए भयानक त्रासदी जैसा होगा।



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