बेंगलुरु में नए साल की रात को महिलाओं के साथ हुई घटना एक विभत्स और दिल को दहला देने वालीं घटना हैं।  महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली इस तरह की घटनाए पुरुष प्रधान देश के लोगों की मानसिकता को दर्शाता हैं। क्या इस देश में महिलाओं को आज़ादी से जीने का कोई अधिकार नहि हैं। ये वही देश हैं, जहाँ महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता हैं, उनकी पूजा की जाती हैं। और उसी देश में खुले आम महिलाओं के साथ ऐसी घिनौनि दुर्घटना होती हैं।

बेंगलुरु की इस घटना के बाद देश के बड़े बड़े फ़िल्मी दुनिया के कलाकारों ने इसकी कड़ी आलोचना की और अक्षय कुमार ने तो ऐसे लोगों कि लिए कड़े क़दम महिलाओं को लेने की सलाह तक दीं।

परंतु इसी देश में उस घटना की कोई चर्चा नहि कर रहा हैं, जो की नोट बंदी के कारण हुयी हैं। दिल्ली में एक महिला ने बैंक से पैसे ना मिलने और नोट ना बदले जाने के कारण अपने कपड़े उतार कर विरोध जताया था। ऐसा ही एक हादसा हाल ही में आर बी आइ ऑफ़िस के बाहर हुआ, जहाँ एक महिला अपने बच्चे के साथ नोट बदलने गई थी, और नोट ना बदले जाने कि कारण, अपने कपड़े उतारकर प्रदर्शन किया। हमें ऐसे लोगों की मनोस्तिथि को समझना होगा। इस नोट बंदी  ने आम इंसान को ऐसी मनोस्तिथि में पहुँचा दिया है। ख़ास करके महिलाओं का ।

बेंगलुरु की घटना को अंजाम देने वाले कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया गया हैं। परंतु बैंक के बाहर और आर बी आइ के बाहर हुई घटना के लिए कौन जिम्मेदार हैं। देवी स्वरूप महिलाओं को इस मनोस्तिथि में पहुँचने का ज़िम्मेदार कौन हैं। 150 से ज़्यादा जाने चली गई बँको की लाइन में । इन मौतों के लिए कौन जिम्मेदारी लेगा। उन परिवारों पर क्या गुज़र रहा होगा, जिनके परिवार की महिलाओं ने ऐसे क़दम उठाए। उन परिवारों में आज क्या परिस्थिति होगी जिनके परिवार का कमाने वाला सदस्य बैंक की लाइन में खड़े खड़े चल बसा। उनके परिवार के सदस्यों का जीवन कैसे चल रहा होगा। क्या वो सक्षम है।

इन सब सवालों के जवाब मिलना अभी बाक़ी है। असल में ये सवाल नही हैं। ये एक ज़िम्मेदारी हैं, जो इस सरकार को नोट बंदी का फ़ैसला लेने से पहले सोचना था। भले ही सरकार की मंशा अच्छी रही हो। परंतु परिणाम बयावह हैं।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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