शायरा बानो की हिम्मत को दाद देनी होगी। वह तीन तलाक के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय पहुंचीं। उनके इस कदम से कट्टरवादियों की नींद हराम है, तो दूसरी ओर तीन तलाक पर बहस हो रही है

बीते वर्ष को महिला अधिकारों के लिए याद किया जाएगा। इस वर्ष तीन तलाक के साथ-साथ महिलाओं के मंदिरों और दरगाहों में प्रवेश को लेकर भी कई अच्छे निर्णय हुए और सबसे बड़ी बात उनका पालन भी हो रहा है। वर्ष के शुरू (फरवरी) में तीन तलाक को लेकर जो बहस शुरू हुई, वह अब भी जारी है। बहस तब शुरू हुई जब उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली 42 वर्षीया शायरा बानो ने अपने पति द्वारा दिए गए तलाक को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसके दो बच्चे हैं। इलाहाबाद के रिजवान से 15 साल पहले उसकी शादी हुई थी। शायरा अपने पति की बार-बार शारीरिक यातना देने की आदत और उसके बीमार रहने से मानसिक रूप से इतनी परेशान थी कि कुछ दिन सुकून से रहने की गरज से वह मई, 2015 में अपने मायके चली आई। सोचा था, कि दिमाग की परेशानी कम होने पर लौट जाएगी। लेकिन अक्तूबर,  2015 में उसे रिजवान का भेजा तलाकनामा मिला, तो वह सन्न रह गई। बहुत समझाने पर भी रिजवान ने तलाक वापस नहीं लिया। आखिरकार न्याय मिलने की उम्मीद में उसने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने की ठान ली। शायरा ने सवार्ेच्च न्यायालय में याचिका दायर करके तीन तलाक की कानूनी वैधता पर सवालिया निशान लगा दिया। इसके जरिए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 के अनुच्छेद 2 की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया। यही वह एक्ट है जिसके जरिए शरीयत एक से ज्यादा शादियों, तीन तलाक, निकाह और हलाला जैसी रवायतों को जायज ठहराती है। याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम-1939 के बेमानी होने की बात की गई है।शायरा के बाद देश की अनेक तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की गुहार लगाई है। इन महिलाओं को केन्द्र सरकार का साथ मिल रहा है। केन्द्र सरकार कह रही है कि तीन तलाक एक सामाजिक बुराई है। इसे खत्म करना ही चाहिए। वहीं मुसलमानों के अनेक संगठन यह कहते हुए इसका विरोध कर रहे हैं कि यह मजहबी अधिकारों में सरकारी दखल है। इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दारूल उलूम, देवबंद के जनसंपर्क अधिकारी अशरफ उस्मानी कहते हैं, ”औरतों के अधिकारों के नाम पर इस्लाम के प्रभाव को कम करने की कोशिश की जा रही है, यह सहन नहीं किया जाएगा।” वहीं मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाले तीन तलाक को कुरान के खिलाफ मानते हैं। वहीं मंुबई की हाजी अली दरगाह में अदालत के दखल के बाद महिलाओं का प्रवेश हुआ। 29 नवंबर को पहली बार 80 महिलाओं ने दरगाह में प्रवेश किया और अमन की दुआ मांगी। पत्रकार फरहत रिजवी कहती हैं, ”इस वर्ष मुस्लिम महिलाओं के लिए सकारात्मक संदेश मिले हैं। जो लोग महिलाओं को हाशिए पर रखना चाहते हैं, उनकी हार हुई और महिलाओं ने हल्की-सी लड़ाई जीत ली है।” हाजी अली में महिलाओं के प्रवेश की मांग दो वर्ष पहले भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने की थी। लेकिन दरगाह के संचालकों ने मना कर दिया था। इसके बाद इस संगठन ने अदालत का सहारा लिया। इस वर्ष मुुंबई उच्च न्यायालय ने संगठन की याचिका का निबटारा करते हुए दरगाह संचालन समिति को आदेश दिया था कि वह दरगाह में महिलाओं को प्रवेश करने दे। इसके बाद दरगाह के संचालक सर्वोच्च न्यायालय गए। अक्तूबर महीने में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए महिलाओं के हक में फैसला सुनाया
वहीं यह वर्ष हिंदू महिलाओं के लिए भी अच्छा रहा। महिलाओं को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिंगणापुर मंदिर में प्रवेश मिला। उल्लेखनीय है कि इस मंदिर में 400 साल से महिलाओं का प्रवेश बंद था। 29 नवंबर, 2015 को विवाद उस समय बढ़ा जब एक महिला शनि मंदिर के चबूतरे पर चढ़ गई। इसके बाद पुजारियों ने उस चबूतरे को धोया। यह वहां मौजूद महिलाओं को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए आंदोलन चलाया। इसके लिए भूमाता ब्रिगेड की स्थापना की गई और कानूनी लड़ाई भी लड़ी गई। आखिरकार मुंबई उच्च न्यायालय ने 1 अप्रैल, 2016 को महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को सुनिश्चित कराए। इसके कुछ दिन बाद उस मंदिर में महिलाओं को प्रवेश मिल गया। शनि शिंगणापुर मंदिर के बाद कुछ अन्य मंदिरों में भी महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिली है। इनमें प्रमुख है केरल का सबरीमला मंदिर। दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग की अध्यक्ष रहीं प्रो. अशुम गुप्ता कहती हैं, ”भेदभाव और शोषण के विरुद्ध कुछ महिलाओं ने हिम्मत दिखाई। इसके अच्छे परिणाम भी मिले हैं। देश के विकास में जितना योगदान पुरुषों का है, उतना ही महिलाओं का है। इसलिए महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार न हो।कुछ महिलाओं का मानना है कि 21वीं सदी में भी महिलाओं को अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, यह ठीक नहीं है। राष्ट्रीय सेवा भारती की सह सचिव रेणु पाठक कहती हैं, ”महिला समाज का अभिन्न अंग है। उसको बराबरी का अधिकार और सम्मान देना, पुरुषों का कर्तव्य है। संघर्ष से अधिकार तो मिल जाते हैं, पर सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है। इसको बचाने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों को समझदारी दिखानी होगी उम्मीद की जा सकती है कि समय में यह समझदारी बढ़ेगी। क्योंकि तीन तलाक पर हो रही बहस उस मुकाम पर पहुंच गई है, जहां से वापस लौटना संभव नहीं है।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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