सं. 1947 के बाद से देश में तरह तरह की सरकारें आती रही हैं और अपनी – अपनी विचार धारा के माध्यम से जनता को प्रेरित व प्रभावित करती रही हैं। जब भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर आया तब देश आज़ादी के रंग में डूबा हुआ था, उस समय देश की जनता देशभक्ति और एकता के सूत्र में बंधे थे। ये बात और थी कि भारत के विभाजन के पूर्व साम्प्रदायिकता का जो बीज अंग्रेजों ने हमारी धरती पर बोया था  वो अब तक अपनी जड़ें मजबूती से जमा चुका था और उसकी शाखाएं देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँच चुकी थीं। गांधी जैसे संत देश और दुनिया से विदा हो चुके थे मगर उनकी विचारधारा को जन – जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाए देश के कुछ मतवाले अपने देश वासियों को एक सूत्र में बांधे रखने में जुटे थे। ये सही है कि हमारे देश में तमाम महापुरुषों ने जन्म लिया और समय समय पर देश का मार्गदर्शन भी किया मगर ये भी सही है कि यदि उन महापुरुषों के प्रयासों को अनदेखा करके अलग राह चलना भी चाहें तो नही चला जा सकता। यही कारण रहा है कि आज भी कुछ राजनैतिक दलों में उन महापुरुषों को अलंकृत व सुशोभित कर के तथा महिमामण्डित करके राजनैतिक दलों द्वारा अपनी दलिय विचारधारा के साथ जोड़ कर बताया जाता है ताकि जनता में जो लोग उन महापुरुषों के बारे में जानते हों अपनी पसंद के दलों के साथ पाएं। मगर आजकल तो ऐसा लगता है जैसे नेताओं में महापुरुषों को हाइजैक करने का फैशन हो गया है। नेताओं द्वारा हो रहे महापुरुषों का राजनीतिकरण कहीं जनता को फिर से समूहों में बांटे जाने हेतु एक प्रयास तो नही? क्योंकि कोई दाल राम के नाम पर तो कोई अम्बेडकर के नाम पर और तो और गोडसे जैसे हत्यारे के नाम पर भी कुछ लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। ये सही है कि सब अपनी अपनी विचारधारा को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं मगर सकारत्मक बातों से ही हम एक सकारत्मक समाज का निर्माण करते हैं। कोई पिता कभी नही चाहेगा कि उसका पुत्र उन गलतियों को दोहराए जो उससे जीवन में हुईं। सभी सकारात्मक बातों को प्रकाश में लाना चाहते हैं और नकारात्मक बातें गुमनामी के अंधेरों में छोड़ देना चाहते हैं। मगर क्या ये संभव है कि सूर्य अपना तेज किसी व्यक्ति, समुदाय या जाति विशेष को ही देता हो? या पुष्प अपनी सुगंध किसी विशेष प्रकार के व्यक्तियों तक ही सीमित रखता है? यदि इसका उत्तर हाँ है तो कोई बात नही परंतु यदि इसका उत्तर नही है तो क्या हम अपने विवेक का इस्तेमाल कर के ये नही सोच सकते कि जिन श्री राम का नाम लेकर भाई को भाई से लड़ने के बारे में कुछ लोग लगे हैं क्या उन्होंने कभी ऐसा करने के लिए कहा था? या जो लोग दिन में 50 बार राम नाम जपते हैं क्या वास्तव में उन्ही को अधिकार है श्री राम में आस्था रखने का या ये महज़ लोगों को विचारधारा में बाटने का एक प्रयास है? क्या कोई धर्म किसी दूसरे धर्म को नीचा दिखाने की बात करता है या कोई ऐसा धर्म भी है जिसके मार्ग मानवता के संरक्षण और एकता के सिवाए भी कुछ और बताते हैं?
क्योंकि अगर यही हाल रहा तो हो सकता है कि आने वाले समय में महापुरुषों का कॉपीराइट ले कर राजनीतिक दल अपनी-अपनी बिसात पर जनता को चलाएंगे और जनता केवल अच्छे दिनों के सुनहरे स्वप्न देखती ही रहेगी।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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