उस दिन डाॅटर्स डे था जब 24 सितम्बर की रात को 12 बजे के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में
लाठियां चली, बच्चों और बच्चियों को पीटा गया । हम सबने देखा कि इस तरह बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय के कुलपति ने सफेद झूठ बोला और गलत बयानी की। आज सारे देश में शिक्षण संस्थाआओ,
विश्वविद्यालयों, आई आई टी, स्थास्थ्य संस्थान सहित तमाम संस्थाओ का भगवाकरण किया जा रहा है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघीयकरण का मेरा मतलब है, छोटी कक्षाओं की तरह विश्वविद्यालयो में भी इस
तरह का माहौल पैदा किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आरएसएस जिस सोच को बढावा
देता है, उस सोच की शुरूआत हो चुकी है। पहले विपक्ष को खत्म करना, विपक्ष के ऊपर इस तरह के
प्रहार करना कि विपक्ष रक्षात्मक अंदाज मे आ जाए, उसके बाद बुद्विजीवियों को मारना, उनके अन्दर भय
पैदा करना क्योंकि यह उनका एक मोडस आपरेण्डि है। चाहे वो हैदराबाद में रोहित वेमूला को फाँसी पर
चढना पड़ा हो, चाहे चेन्नई में उन बच्चों के साथ जो हालात हुए और चाहे फिर जेएनयू में और अब
बनारस विश्वविद्यालय में।
हमने देखा कि किस तरह से उ0प्र0 के चीफ सेक्रेट्री और जिला प्राधिकरण ने अपना सही बयान दिया
था, बयान लिखकर मुख्य सचिव को भेजा गया था, लेकिन उसके बाद हफ्ते भर के बाद वह बयान बदल
दिया गया। ऐसा ही गोरखपुर में हुआ, ऐसा ही फरूख्खबाद में हुआ और अब ऐसा ही वाराणसी में हुआ।
वाराणसी के कमिश्नर की जो प्राथमिक रिपोर्ट है, वह कुछ इस प्रकार है, कमिश्नर ने मुख्य सचिव राजीव
कुमार को भेजी अपनी प्रारांभिक जांच रिपोर्ट मे कहा कि ‘‘ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रशासन ने
पीड़िता की शिकायत को संवेदनशील तरीके से नही संभाला, ना ही स्थिति को सही वक्त पर संभाला।
इसी वजह से इतना बड़ा बवाल हुआ।’’
यह वहाँ के कमिश्नर की रिपोर्ट है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे हुए छात्रों के ऊपर जो कांड हुआ है,
अगर इसका कोई जिम्मेदार है तो वो तीनों ऐजेसियां है विश्वविद्यालय प्रशासन और उनके अधिकारी,
जिला प्रशासन और उनके अधिकारी, पुलिस प्रशासन और उनके अधिकारी। टीवी पर देखा कि कुलपति
ने जिस तरह से अपना बचाव किया है, यह किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए इससे बढकर शर्म नाक
कोई बात नही होगी। मैं कल रात को टीवी देख रहा था और जिस तरह से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
के कुलपति की गलत बयानी हो रही थी, जिस तरह का उनमें भरोसा और विश्वास था, मुझे देखते देखते
शर्म आ रही थी कि किस तरह से वो बचाव की मुद्रा में आ गए और किस तरह से वो अपनी दलीलें दे
रहे है। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि छात्र महामना मदनमोहन मालवीय जी की मूर्ति को वहां पर
नुकसान पहुंचा रहे थे, इसलिए यह सब कुछ हुआ और इसलिए पुलिस ने वहां पर कार्यवाही की होगी।
यह रिपोर्ट सोच समझ कर दी गई, यह रिपोर्ट तीन दिन के बाद लिखाई गई है।
मेरे ख्याल से आप मीडिया के मेरे तमाम साथी बगले झांकना शुरू कर दिए होगें, कि वहाँ पर किसी भी
तरह का लाठी चार्ज नही हुआ है। मेरे पास में आपके ही द्वारा दिखाये गये वीडियो है, कुछ टीवी द्वारा
लिए गए वीडियो है, आप चाहे तो मै आप को दे सकता हूं और यहां पर उसकी आवाज सुना सकता हूं।
मै चाहूंगा कि आप इसको जरूर देख ल। कुलपति महोदय ने, जो आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ
है, कि किसी यूनिवर्सि टी के 1000 विद्यार्थि यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई हो। जब भी पुलिस
में रिपोर्ट दर्ज कराई जाी है या एफआईआर दर्ज होती है तो लिखा जाता है ‘‘अज्ञात लोग’’ लेकिन
कुलपति जी की शह के ऊपर ये रिपोर्ट लिखी गई है-1000 अज्ञात विद्यार्थी, ये एफआईआर की रिपोर्ट
है, एफआईआर की कापी ह ै। कुलपति साहब ने यूनिवर्सि टी के अंदर जिस तरह से माहौल बनाया और
जिस तरह से वहा पर अपने लाॅन मे लोगों से बातचीत करते हुए कहा कि अगर एक छात्रा की शिकायत
पर हमने गौर करना शुरू कर दिया, तो विश्वविद्यालय कैसे चलाएगे ? इससे ज्यादा असंवेदनशील
अभिभावक कोई और नही हो सकता। मै फिर से इस बात को दोहराना चाहता हूं, प्रधानमंत्री महोदय,
आप ने जो नारा दिया था ‘‘बेटी पढाओं बेटी बचाओं’’, आप ने किस तरह के लोगों के हाथ में बेटियो को
दिलवा दिया ? मां बाप न े अपन े घरो स े इन बच्चियों का े भेजा हास्टल मे ं और वा े भी बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय में और उसका अभिभावक जो है, कुलपति ह ै, और अगर कुलपति इस तरह की भाषा
बोलता है तो शायद आपका े अपन े नार े को बदलकर ए ेसा करना पड़ेगा – ‘‘बेटी पढ ़आ ें और ब ेटी
पिटवाओं’’। इसस े ज्यादा ग ंभीर और क्या बात हो सकती है ? अगर द ूध का द ूध आ ैर पानी का पानी
करना ह ै, तो मेरी मांग है कि जो म ैन ें वहां भी कहा है और मैं यहां भी कहूगां कि सभी पार्टि यों क े
स ंासदो की एक कमेटी वहा ं जानी चाहिए, जो घटना की जांच कर ें, क्या ेंकि यह घटना मामूली नहीं है।
कोई भी विश्वविद्यालय, किसी क े भविष्य का सवाल है। जिस तरह स े यहां पर राष्ट्रीय स्वयं स ेवक
स ंघीयकरण किया जा रहा है, तमाम विश्वविद्यालय क े अन्दर एक भय का माहौल पैदा किया जा रहा है
और वो ऐसा भय, जिसम ें जा े आवाज ़ उठाएगा, वो पिट कर जाएगा, चाह े वो बुिद्वजीवी हो, चाह े विद्यार्थी
हो चाहे राजनेता हो और जा भी जांच हो, उस जांच तक इस कुलपति क ेा हटा देना चाहिए, क्या ेंकि
वर्त मान कुलपति क े पद पर रहत े हुए सही जांच नही हो सकती।
जब यह वारदात ह ुई थी उस समय प्रधानमंत्री बनारस में थे। वह वहां क े सा ंसद भी है। उनका फर्ज
बनता था जहां बच्चों का े पीटा गया है वहा ं चले जात े वह उनके पिता के समान है, लेकिन पिता की
भ ूमिका वह नही ं निभा पाए, शायद वह सांसद पिता की भूमिका नही निभाना चाहते थ े।
यह प्रद ेश का मसला नहीं है। मारपीट विश्वविद्यालय क े अन्दर हुई है और अगर बाहर हुई ह ै तो इसकी
जांच उ0प्र0 सरकार करा सकती है लेकिन यदि अंदर ह ुई है वह केन्द ्र सरकार के क्षेत्र आता ह ै क्या ेकि
क ेन्द ्रीय विश्वविद्यालय क ेन्द ्र की है और कुलपति राष्ट्रपति के अधीन हा ेत े ह ैं। इसक े बारे में अगर का ेई
जांच हा ेगी तो वह क ेन्द ्र में आ ैर क ेन्द ्र स े अगर होती ह ै तो वह सांसदों क े द्वारा होनी चाहिए।



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