8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिया गया ऐतिहासिक फैसला जिसके बारे में आज लगभग एक साल बाद भी भारत की जनता नही समझ पाई की इसका मुख्य आशय क्या था?

क्या नोटबन्दी से अच्छे दिन आएंगे?
देश की अर्थव्यवस्था में क्या उछाल आएगा?
क्या सबके खातों में 15 – 15 लाख आ जायेंगे?
क्या काला धन सरकार को मिल जाएगा?
क्या कैशलेस इकॉनमी देश में लागू हो जाएगी?
क्या डिजिटल ट्रांसेक्शन द्वारा ही आदान प्रदान होगा?
क्या नोटों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा?

इन सवालों  को लेकर लोग 8 नवंबर, 2016 के बाद से पूरा दिन बैंकों के बाहर खड़े रहते और अपना खून पसीने का जमा धन बैंकों में जमा कराने के लिए जीतोड़ कोशिश करते।

लोगों के पास से पैसा ऐसे निकल रहा था जैसे गंगा बह रही हो और बैंकों का हाल जैसे भारतीय महासागर हो। न्यूज़ चैनलों से लेकर सोशल मीडिया, अखबार से लेकर चाय की दुकानों तक यही चर्चा थी कि नोटबन्दी से अब एक बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा।

हालांकि विपक्ष के नेता एवं कांग्रेस पार्टी के नायक श्री राहुल गांधी के नेतृत्व में स्तिथि की गंभीरता का अवलोकन त्वरित रूप से हो जाने के बाद से ही सरकार के इस कठोर फैसले की चौतरफा निंदा एवं भर्त्सना होने लगी थी परंतु जनता को इस बात से रुबरु होने में भारतीय मीडिया ने जो साहस दिखाया वो शायद मुकम्मल तौर पर असरदार न रहा।

देश के लोकतंत्र को चतुर्थ स्तम्भ के रूप में जो सहारा देश की मीडिया से मिलना संभव है यदि उसके बुनियादी ढांचे के साथ किसी प्रकार से छेड़छाड़ होती है तो देश की अस्मिता, अखंडता व लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक भयंकर खतरे के रूप में देखा जा सकता है। जिसका परिणाम प्रायः प्राथमिक रूप से मीडिया पर से जनता के विश्वास को समाप्ति के रूप में देखा जा सकता है।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह जी ने अपने कुशल ज्ञान का परिचय देते हुए मोदी सरकार को इस बाबत आगाह भी किया था कि देश की अर्थव्यवस्था पर नोटबन्दी का नकारात्मक परिणाम होगा और जनता को इस फैसले की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

हुआ भी वही, किसी की शादी का जश्न फीका हुआ तो किसी की बरात लौट गई तो कोई धनाभाव में बारात ले ही नही जा सका। छोटे व्यापारी तो एकदम हाशिये पर पहुच गए बिना कैश के कोई लेन – देन ना कर पाने के कारण उनका धंधा चौपट हो गया। यहाँ तक अर्थी का सामान भी ना ले पाने के कारण कितने परिवार कष्ट के दौर से गुजरते हुए प्रभावित हुए। किसानों के ऊपर जिस प्रकार से गाज गिरी उसके बाद ना जाने कितने किसानों ने आत्महत्या कर ली। मकानों के निर्माण से लेकर सरकारी जन विकास के तमाम कार्य बाधित हुए और देश के विकास की गति को इमरजेंसी ब्रेक लग गए। गृहणियों ने तो इस निर्णय का बैंकों की लाइन में खड़े खड़े ही विरोध जताना शुरू कर दिया था।

ऐसा इस लिए हुआ क्योंकि मोदी सरकार का मनना था कि काले धन की काली कमाई को सरकार के ख़ज़ानों तक लाए बिना जनता का विकास असंभव है और जनता जो कब से मोदी जी के सत्ता में आने बाद से अच्छे दिनों का इन्तेज़ार कर रही थी उसमें भी उत्सुक्ता थी कि शायद मोदी जी का यह कठोर फैसला देश को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाए और 1000 – 500 के जो नोट काले कारोबारियों और रिश्वतखोरों की तिजोरियों में बंद हैं वो बाहर आएंगे।

वहीं दूसरी ओर आर. बी. आई. (भारतीय रिज़र्व बैंक) की रिपोर्ट के अनुसार 500 व 1000 के जो नोट 31 दिसंबर 2016 तक जमा हुए थे वो देश में छपे हुए कुल नोटों का 98.96 प्रतिशत थे। इसका मतलब जो शेष 1.04 प्रतिशत वो क्या काला धन था?

परंतु अभी तो जनता को और समय चाहिए था क्योंकि बहुत सारे लोग विदेशों में थे और कितने लोगों ने तो जानकारी के अभाव में अभी तक अपने पुराने नोट जमा ही नही करवाए थे। कोई बीमार था तो कोई जेल में था, किसी के घर में मौत मिट्टी हो गई थी तो कोई अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझा होने के कारण अपने नोट नही बदलवा पाया था।

अब जब यह सारी नोट बदलने की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी तो देश यह जानने को उत्सुक था कि आखिर परिणाम क्या निकला। ऐसे समय में जब देश को सच्चाई का आइना दिखाने की हमारे मीडिया तंत्र को आवश्यकता थी तब तक मीडिया का पूरा ध्यान 5 राज्यों क्रमशः उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोआ और मणिपुर में होने वाले चुनाव पर केंद्रित हो चुका था।

जनता ने एक बार फिर से मोदी जी के वादों पर भरोसा कर के उनके नाम पर 5 में से 4 राज्यों को भा. ज. पा. की झोली में डालकर किया। परंतु ऐसा नही था कि देश जानना नही चाहता था कि नोटबन्दी से उसको क्या हासिल हुआ।

शायद यही बताने के लिए भा. ज. पा. आगामी 8 नवंबर नोटबन्दी को एक महान उपलब्धि मानते हुए जश्न के रूप में मनाएगी वहीं दूसरी ओर नोटबन्दी की असफल कोशिशों को दृष्टिगत रखते हुए और आम जनता को जिन कष्टों का सामना करना पड़ा उन सभी दर्द और तकलीफों को याद करते हुए राहुल गांधी सहित सम्पूर्ण कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के साथ इस दिन को इतिहास के पन्नो में काले दिवस के रूप में मनाने की तैयारी में हैं।

अब देखना ये है कि जनता किसका साथ अपनाती है और कौन जनता का असली हमदर्द साबित होता है ? क्या अच्छे दिनों का वादा वास्तविक रूप लेगा या मात्र एक और जुमला बन कर रह जाएगा ? देखना ये भी है कि नोटबन्दी की पुण्यतिथि मनेगी या भा. ज. पा. का जश्न?

 



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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