वसंत पंचमी पर महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्मदिन मनाने की परंपरा १९३० में प्रारंभ हुई।महाकवि निराला से जुड़ा एक रोचक किस्सा पढ़ने को मिला, सोचा आज के दिन आप सबसे साझा किया जाए।

पंडित नेहरू निराला के करीबी मित्रों में से एक थे जो समय समय पर उनका हालचाल लेते रहते थे। यही नहीं पंडित जी ने महादेवी जी के माध्यम से उनकी आर्थिक मदद की व्यवस्था भी कराई।

एक बार की बात है पंडित नेहरु चीन की यात्रा से लौटे।गृहनगर इलाहाबाद में उनकी जनसभा थी।स्वागत में गले मे पड़ रही मालाओं के बीच उनकी नजर सामने की पंक्ति में बैठे कविवर निराला पर पड़ी। निराला उस समय अखाड़े से पहलवानी करके आये थे,उनका शरीर मिट्टी और तेल से सना हुआ था और शरीर पर मात्र एक गमछा था।

पंडित नेहरू ने बोलना शुरू किया कि मैं चीन गया था, वहाँ मैंने एक महान राजा की कहानी सुनी। राजा के दो बेटे थे एक कमअक्ल और एक बेहद बुद्धिमान। बच्चे जब बड़े हुए तो राजा ने दोनों को बुलाकर कमअक्ल लड़के से कहा कि तुम राजपाट संभालो क्योंकि तुम केवल यही कर सकते हो।

बुद्धिमान और अक्लमंद लड़के के लिए राजा ने कहा कि यह एक महान कार्य के लिए पैदा हुआ है, यह कवि बनेगा। यह कहकर नेहरू ने अपने गले की मालाएं उतारी और मंच से नीचे आकर ‘निराला’ के पैरों में सम्मान स्वरूप रख दीं। यह देखकर पूरी सभा स्तब्ध रह गई।

 

लेख हिंदुस्तान समाचार पत्र से उद्धृत



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