अहमदाबाद ।। गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं और भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत पा लिया है। इसके बावजूद भी कहीं न कहीं भाजपा खेमे में मायूसी देखी जा रही है। इस मायूसी की वजह गुजरात चुनाव में भाजपा को पहले की अपेक्षा कम सीटें मिलना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के धुंआधार चुनावी सभाएं करने के बाद भी पार्टी के जनाधार में आई गिरावट है। चूंकि भाजपा अपने बूते सरकार बनाने जा रही है यानी वह जीत गयी है। लेकिन इस जीत के बाद भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या भाजपा सचमुच जीती है? विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि इस जीत में बीजेपी की बड़ी नैतिक हार छिपी हुई है। यकीन दिलाने के लिए कुछ तर्क दिए जा सकते हैं।
पिछले 22 वर्षों से गुजरात भाजपा का शासन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह प्रदेश है, गुजरात। वास्तव में गुजरात के कथित विकास मॉडल को प्रचारित कर ही बीजेपी ने 2014 में केंद्र की सत्ता हासिल की थी। गुजरात हिंदुत्व की पहली प्रयोगशाला थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस की बुनियाद बनाने के लिए तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा गुजरात के सोमनाथ से शुरू की थी। छह फरवरी 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद गुजरात में भी दंगे हुए थे। उन दंगों के बाद जैसा कि कई राज्यों में हुए चुनावों में हुआ, गुजरात में भी 1995 में बीजेपी सत्ता में आई। 2001 में आंतरिक संकट से जूझ रही पार्टी ने उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक नरेंद्र मोदी को गुजरात में मुख्यमंत्री बनाया। मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी 2001 प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी हारी थी। स्थिति बदली 2002 में 27 फरवरी को गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के दो डिब्बों में आग लगने की घटना के बाद। इस घटना को भुनाया गया और गुजरात में हुए दंगों में कथिततौर पर 2000 से अधिक निर्दोष जानें गयीं। आज़ादी के बाद सबसे भयावह दंगों में गुजरात दंगों का शुमार किया जा सकता है। दंगों के बाद केंद्र में सत्तासीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगाने से लेकर मोदी का इस्तीफ़ा लेने का दबाव था। गुजरात दौरे पर आये तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने मोदी को ‘राजधर्म’ की याद भी दिलाई पर आडवाणी ने मोदी को बचाया। दो महीने बीतते न बीतते तो खैर वाजपेयी ने भी अपना सुर बदला और गोवा में भाजपा की बैठक में दंगों को न्यायोचित्त ठहराते हुए कहा, ‘पहले आग किसने लगायी?’ प्रधानमंत्री के इस बयान से शह पाकर मोदी ने गुजरात में लौटकर विधानसभा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी। यह अप्रैल 2002 की बात है। याद रहे, गुजरात में ऐसे तनावपूर्ण माहौल में चुनाव कराने को लेकर तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त जेएम लिंगदोह ने कहा था, “गुजरात में इस समय चुनाव करवाने की बात कोई पागल ही कर सकता है।” मोदी भड़क गए थे और हमें पहली बार पता चला था कि जेएम लिंगदोह का पूरा नाम ‘माइकल जेम्स लिंगदोह’ था। खैर चुनाव उस साल दिसंबर में हुए और जैसा कि अपेक्षित था, भाजपा ने साम्प्रदायिकता की खेती कर बड़ी सफलता हासिल की। 127 सीटें जीतीं। उसके बाद से यह लगभग पक्का हो गया कि गुजरात में भाजपा को हराना संभव नहीं हैं। कांग्रेस कमज़ोर होती गयी। 2007 में बीजेपी से कांग्रेस में आये शंकर सिंह वाघेला के नेतृत्व में लड़ा चुनाव भी पार्टी हार गयी और 2012 में भी पार्टी कुछ नहीं कर पायी। उल्लेखनीय है कि केंद्र में इस बीच 2004 से 2014 तक कांग्रेस नीत सयुंक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार थी। यानी पिछले दो चुनावों में कांग्रेस की हालत इतनी भी खराब नहीं थी।
अब हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव पर आते हैं। 2014 में केंद्र में अपने सबसे बुरे प्रदर्शन (44 सांसदों) से कांग्रेस बुरी तरह टूटी हुई थी। उसके बाद एक के बाद एक कई प्रदेशों में (महाराष्ट्र, गोवा, आसाम) कांग्रेस हारती गयी। बिहार में महागठबंधन (कांग्रेस जिसका हिस्सा थी) के जीतने के बाद भी नितीश कुमार के पाला बदलने और बीजेपी की गोद में जा बैठना और उत्तर प्रदेश में भाजपा की बड़ी जीत भी कांग्रेस के लिए आघात जैसी थी। लगातार इतनी हार किसी भी पार्टी और उसके नेता (कांग्रेस के मामले में राहुल गाँधी क्योंकि पिछले कुछ समय से सोनिया गाँधी स्वास्थ्य की वजह से सक्रिय नहीं हैं) का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है। कुछ महीने पहले तक कोई विश्लेषक यह मानने को तैयार नहीं था कि गुजरात में कांग्रेस भाजपा को कोई चुनौती देने की स्थिति में है। यानी बीजेपी का जीतना तयशुदा था। चर्चा अंतर पर होती थी। आमतौर पर माना जाता था कि भाजपा बड़े अंतर से जीतेगी। लेकिन तस्वीर पिछले कुछ महीनों में बदली। गुजरात के फर्जी विकास मॉडल की पोल खोलते हुए, जीएसटी, बीजेपी के भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाते हुए राहुल गांधी के प्रचार, पिछले कुछ सालों में आन्दोलनों से निकले नेताओं हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी से गठजोड़/तालमेल कर कांग्रेस ने चुनाव को एकतरफा होने से बचा लिया और बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। यह कोई छोटी बात नहीं है। कांग्रेस की शराफत देखिये, बेरोज़गारी और नकली विकास के कारण गुजरात से निकले नारे “विकास पागल हो गया है!” को पार्टी ने छोड़ दिया जब प्रधानमंत्री ने नारा दिया, “मैं विकास हूँ, मैं गुजरात हूँ!” मणिशंकर अय्यर की टिप्पणी को जाति से जोड़कर प्रधानमंत्री ने भुनाया पर कांग्रेस ने (विश्लेषकों के अनुसार डैमेज कण्ट्रोल के लिए ही सही) अय्यर को निलंबित कर दिया। एक गलत ट्वीट करने के बाद राहुल ने वापस ले लिया यह कहते हुए, “मैं इंसान हूँ और मुझसे गलती होती है”। दूसरी तरफ बीजेपी ने क्या किया? कितने सफ़ेद झूठ बोले और वापस लेना तो दूर स्वीकार भी नहीं किया। मोदी ने प्रधानमंत्री की गरिमा को तब ठेस पहुंचाई जब उन्होंने अय्यर के घर एक निजी आयोजन को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को लपेटते हुए बेतुका  आरोप लगा दिया कि पाकिस्तान गुजरात में अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। मंशा साफ़ थी, कांगेस को पाकिस्तान और मुस्लिमों से जोड़कर गुजरात के हिन्दुओं का भयादोहन करना। कांग्रेस पर जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगाती बीजेपी भूल जाती है कि वह शुरू से सांप्रदायिक राजनीति कर रही है। बल्कि उसकी सफलता की इमारत ही सांप्रदायिक राजनीति की बुनियाद पर खड़ी है। चुनाव जीतने के बाद अब बीजेपी यह कह रही है कि जीएसटी कोई मुद्दा नहीं था तो फिर चुनाव से ज़रा पहले जीएसटी दरों में बदलाव क्यों किया गया और इसकी प्रक्रिया सरल क्यों की गयी? खैर विषयांतर हो रहा है, तो गुजरात पर लौटें। गुजरात में 150+ सीटें जीतने का दावा करने वाली पार्टी 100 के आंकड़े को भी नहीं छू सकी, क्या इसे पार्टी की जीत माना जाएगा? जबकि पार्टी ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी। धनबल से लेकर सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल, विरोधियों के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाने से लेकर सीडी बनाने के हथकंडे अपनाने के बावजूद पार्टी किसी तरह अपनी सत्ता बचा पाई है। क्या इसे पार्टी की जीत माना जायेगा? देखा जाए तो चुनाव में पार्टी के लिए सबक छिपा हुआ है कि 2019 के आम चुनाव में भी उसकी राह आसान नहीं है। यानी एक तरह से नतीजे पार्टी के लिए खतरे की घंटी होने चाहिए।
गुजरात में दरअसल अपना खेल बीजेपी ने खुद ही  बिगाड़ा था। केंद्र में तीन साल से सत्तासीन बीजेपी ने नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक कई जनविरोधी फैसले लिए हैं और विदेशों से काला धन लाकर लोगों के खाते में 15 लाख रुपये डालने से लेकर करोड़ों को रोज़गार देने और ‘अच्छे दिन’ लाने के उसके वायदे ‘जुमले’ साबित हो चुके हैं। उस पर पार्टी के सत्ता में आने के बाद देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ता जा रहा है। गौरक्षा से लेकर लव जिहाद जैसे झूठे मुद्दों पर बेक़सूरों की हत्याएं हो रही हैं। अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है और बढती महंगाई और बेरोज़गारी से कई राज्यों में विभिन्न जातियों (महाराष्ट्र में मराठा, उत्तरी राज्यों में जाट और गुजरात में पाटीदार इसकी मिसाल हैं) के लोगों ने आरक्षण की मांग करते हुए आन्दोलन छेड़े हुए हैं।
गुजरात के नतीजों को इसी पृष्ठभूमि में देखना चाहिए। यह निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से मोहभंग की शुरुआत और बीजेपी के शासन के प्रति लोगों में निराशा को दर्शाते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस जिसका प्रदर्शन पिछले गुजरात  विधानसभा चुनाव के मुकाबले बेहतर रहा है, को भी समझना होगा कि चुनाव जीतने के लिए, खासकर जब आप सत्ता में नहीं हो, पार्टी को अंतिम महीनों में नहीं, पूरे पांच साल मेहनत करनी होती है, स्थानीय स्तर पर समर्पित कार्यकर्ताओं की फ़ौज खड़ी कर, जनता के मुद्दे उठाकर, हर पल जनता के साथ कंधे से कंधा मिलकर खड़े रहकर ही चुनाव जीते जा सकते हैं। कम से कम संगठन की मजबूती पर तो कांग्रेस को ध्यान देना होगा।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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