मोदी सरकार का ये आखिरी बजट था हालांकि ये अंतरिम बजट ही था लेकिन फिर भी बहुत से लोगों को इस बजट से भारी उम्मीद थी। तीन राज्यों की हार के बाद लग रहा था कि किसानों का गुस्सा सरकार तक पहुंच गया होगा पर वो बजट देखकर लग नहीं रहा है। सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए 6000 रुपये सालाना का प्रावधान किया तो किसानों की वो सारी उम्मीद हवा हो गयी जो उन्होने इस सरकार से लगा रखी थी, सरकार जिसे मास्टर स्ट्रोक बता कर प्रचारित कर रही है दरअसल वो समुद्र में एक बूंद के अलावा कुछ नहीं है। इस योजना से बेहतर तेलंगाना की “रयथु बंधु” और उड़ीसा की “कालिया” योजना प्रदर्शन कर रही है। सरकार के पास मौका था किसानों की फसलों की कम कीमतों की भरपाई करने का लेकिन वो मौका विजन की कमी के चलते गवां दिया। इसके विपरित टैक्स रिबेट देकर सरकार ने जरुर मध्यम वर्ग को खुश करने की कोशिश की जो उनकी प्राथमिकता को दिखाता है हालांकि ये चुनावों के लिहाज से भी गलत निर्णय दिखता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हर 100 वोटर में 7 वोटर आयकर रिटर्न भरता है (टैक्स देता है या नहीं ये कंफर्म नहीं है) अगर उसमें से ये 2.5 लाख से 5 लाख के बीच वाले 1-1.5 फीसदी से ज्यादा नहीं होंगे जिनको सरकार लगभग 12 हजार रुपये सालाना प्रति लाभार्थी का लाभ दे रही है जबकि वो अर्निंग सिटीजन है और किसानों को 6 हजार रुपये सालाना पूरे परिवार पर मिल रहे हैं और लगभग 45 प्रतिशत वोटर या तो किसान है या फिर किसान परिवार का हिस्सा हैं। सरकार के ये फैसले उनके नीतिगत पूर्वाग्रह को दिखाते हैं जो किसानों के साथ भेदभाव को दिखाते हैं। तमाम अर्थ शास्त्री और बैंकर इस बात से खुश हो सकते हैं कि सरकार ने राजकोषीय घाटा कम रखा और ऋण माफी की कोई योजना भी नहीं लायी लेकिन सरकार जो राजकोषीय घाटा दिखा रही है वो आंकडों का खेल है जिसे निवेशक बखूबी समझते हैं सरकार बहुत से काम बजट के बाहर से करती है वो बहुत सी योजनाओं के लिए पैसा पब्लिक सेक्टर यूनिट से दिलवाती है जिसका बोझ उसके खातों में नहीं दिखता फिर भी सरकार के पास मौका था कि वो किसानों को कुछ राहत दे भले राजकोषीय घाटा 3.5 प्रतिशत से बढकर 3.8 तक पहुंच जाता वैसे भी ये कोई मानक नहीं है कि वित्तीय घाटा इससे ज्यादा नहीं हो सकता और जब रुरल इकोनॉमी में कैश फ्लो बढता तो वापस खर्च होकर वो पैसा इकोनॉमी में आकर उसे मजबूत ही करता। इसको ऐसा भी समझना भी चाहिए कि सरकार ने 72000 करोड़ रुपए प्रत्यक्ष आय के रुप में किसानों को दे रही है जो उनके सालाना नुकसान 265000 करोड़ रुपए के सामने कुछ भी नहीं है जो कम कीमतों, मार्केटिंग और नीतियों के कारण हुयी तो ऐसे में ये किसानों की कमाई तो छोडिए उनके घाटे को भी पूरा नहीं कर सकती है। जब तक सरकार कुछ बेहतर मार्केटिंग नीतियां और भंडारण की व्यवस्था नहीं करती तब तक किसानों की आय दुगना करना एक जुमला ही समझिए। सरकार द्वारा दी गई आर्थिक सहायता कृषि उपभोग की बजाय गैर कृषि उपभोग की तरफ भी डायवर्ट होने की संभावना होती है इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि बहुत सी राज्य सरकारों द्वारा दिये गये कृषि ऋण उत्पादन के मूल्य से भी अधिक होते हैं इसकी समीक्षा करने का मैकेनिज्म सरकार को लाना चाहिए था और ऋण/आर्थिक सहायता की एक बेहतर व्यवस्था लानी चाहिए थी। किसान क्रेडिट कार्ड इस मामले में एक बेहतर प्रयास था लेकिन नाबार्ड के 2015-16 के वित्तीय समावेशन के सर्वेक्षण से ये पता लगता है कि खाली 10 प्रतिशत किसान ही इन कार्ड का इस्तेमाल करते हैं।
गोवंशों की नस्लों और मत्स्य पालन के लिए अलग संगठन बनाने का लाभ वैसे भी तत्काल नहीं मिलने वाला है और उसका दूसरा पक्ष है ये भी की नस्लों के सुधार से ज्यादा दूध का उत्पादन हो सकता है लेकिन अगर उस दूध की उचित कीमत नहीं मिलेगी तो उस बढे उत्पादन का लाभ पूंजीवादी व्यवस्था को मिलेगा ना की जी तोड़ मेहनत करने वाले पशुपालकों और किसानों को, जब तक सरकार मूल्य निर्धारण और बाजार की नीतियों में कोई ठोस बदलाव नहीं लाती तबतक कुछ भी किसानों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन संभव नहीं है।
अब ऐसे में किसान कांग्रेस या तीसरे मोर्चे की तरफ देख रहा है वो ये भी आंकलन कर रहा है कि कौन सी सरकार उसको तत्कालिक लाभ के साथ बेहतर नीतियां ला सकती है वो ये कांग्रेस अध्यक्ष के किसान कर्जा माफी को भी उम्मीद से देख रही है, राहुल गांधी का तीन राज्यों में ऋण माफी का वायदा राज्य सरकारों ने हफ्ते भर में ही पूरा कर दिया जो उनकी किसानों के प्रति प्रतिबद्धता को दिखाता है इसलिए किसान राहुल गांधी के वायदे पर आने वाले लोकसभा चुनावों में भरोसा कर सकता है और गरीबों के लिए मिनिमम इंकम गारंटी सोने पर सुहागा का काम कर सकती है। कुछ अर्थशास्त्री राहुल के इस वायदे के लिए पैसा ना होने की बात कर रहे हैं लेकिन कांग्रेस पहले भी मनरेगा योजना के समय ये कर के दिखा चुकी है इसलिए पैसे की व्यवस्था से बड़ी समस्या गरीबों के निर्धारण में होगी जो तेंदुलकर और रंगराजन कमेटियों के हिसाब से अलग-अलग है लेकिन अगर नियत हो तो ये समस्या भी सुलझाई जा सकती है।

मोदी सरकार का ये बजट किसानों में और रोष पैदा करेगा, विपक्ष बजट के अगले दिन से ही 17 रुपये प्रति दिन प्रति परिवार को मुद्दा बना रहा है और ये ठीक भी है क्योंकि इतने पैसे में तीन चाय या 250 मिलीलीटर डीजल मिलेगा जिससे कितनी सिंचाई संभव है आप खुद अंदाजा लगा लिजिए। ।

लेखक- अभिषेक सिंह



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