130 करोड़ की आबादी वाला भारत एक ऐसा देश है जहां लोग अपने – अपने विकास को लेकर सुबह से रात तक जद्दोजहद करते रहते हैं।

बड़े – बड़े उद्योगपतियों से लेकर ग़रीब मज़दूरों तक, किसान से लेकर परचून की दुकान तक सभी अपने कारोबार को उन्नति की ओर ले जाने को प्रयासरत रहते हैं।

भारत, जहां विभिन्न संस्कृतियों, जातियों, भाषाओं और धार्मिक विविधताओं का समागम देखने को मिलता है वहां लोग आज भी एक समान अधिकारों के लिए संघर्षरत करते हैं।

ग़रीबी और भुखमरी तथा धर्म कि बिसात पर न जाने कितनी बार देश की जनता को अपनी उम्मीदों पर पानी फिरा मिला।

देश में जब भी कहीं चुनाव का दौर आता है तो नेता अपने जुमलों और लोक लुभावन बयानों के माध्यम से भोली भाली जनता को अपनी अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते देखे गए हैं, कभी गरीबी खत्म करने तो कभी अच्छे दिन आने और जब कुछ न समझ में आया तो मंदिर और मस्जिद के नाम पर जनता को आकर्षित किया जाता रहा है।

8 नवंबर 2016 को भारत सरकार द्वारा लिया गया नोटबन्दी का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना गया। जनता ने ये मान लिया था कि अब काले धन को बेईमानी की अंधेरी तिजोरियों से बाहर निकलकर जनता के बीच आना ही होगा और देश की जनता इस अभियान को अपनाकर पूरी तन्मयता से सफल बनाने में लग गई।

गृहणियों ने अपनी जमा पूंजी को जो उन्होंने किसी कठिन वक़्त के लिए जमा कर रखी थी निकाल निकाल कर बैंकों में जमा करना शुरू कर दिया था। ऐसा प्रतीत होने लगा था जैसे जंगे आज़ादी में बलिदान होने की तैयारी हो रही हो।

लोग अपना कारोबार , दफ्तर, नौकरी और चाकरी सब छोड़ केवल एक अभियान में लगे हुए थे कैसे पुरानी नोटों को बैंक में जमा करवाया जाए और उनके बदले में नई नोट मिल सके।

ये सब जनता ने किया एक आह्वान के तहत, भ्रष्टाचार के खिलाफ, विकास की खातिर एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में कि अब तो अच्छे दिन आ गए समझो।

नोटबन्दी के झटके से अभी देश उबर ही रहा था की साहब ने जी एस टी नाम का एक नया शिगूफा छोड़ कर एक बार फिर मैदान में ये साबित करने का प्रयास किया कि जनता के समर्थन से बनी ये सरकार अब जनता का विश्वास खोती जा रही है और उसी विश्वास को पाने के तहत ये नए नए अविष्कार किये जा रहे हैं।

अब तो हालात ये हो गई है कि सरकार के समर्थन में खड़े दल भी इस बात को दबे छुपे मानने लगे हैं कि लगता नही की इस नोटबन्दी और जी इस टी से कुछ नया होगा ये महज जनता को उलझाय रखने के सरकार के कुछ नायाब तरीको में से हैं। जिसका ताज़ा उदाहरण शिवसेना के एक बड़े नेता के बयान के रूप में उभर कर आया है जिनका मनना है कि कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनकर देश का नेतृत्व करने के बेहतरीन गुण हैं।

मगर हमारे देश की जनता ये बखूबी समझती है कि मंच पर खड़ा कोई भी व्यक्ति हमसे ऐसे खूबसूरत वादे करे जैसे मोदी जी ने सरकार बनाने के पूर्व किया था तो उनको पूरा भी करना होता है खाली बातो और जुमलो से देश का विकास नही होता।

अब आने वाले चुनावों में देखना होगा कि जनता किसके साथ है?

जनता और कब तक इंतेज़ार करेगी ये देखना होगा? असार देख कर ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि जल्दी राहत मिलेगी।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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