स्वतंत्रता के साथ ही भारतीय संविधान में केवल भारतीय नागरिक को ही मान्यता प्रदान की है जिसमें स्त्री पुरुष तक के विविध को मान्यता नहीं प्रदान की गई है तथा उस समय की कठोर जातिगत व्यवस्था को भी कोई मान्यता प्रदान नहीं की गई है लोकतंत्र को मान्यता देने से इसमें धर्म के आधार पर किसी प्रकार के विभेद को कोई मान्यता प्रदान नहीं की गई है यहां तक कि किसी वर्ग विशेष को भी कोई मान्यता प्रदान नहीं की गई है तथा विशेष अधिकारों को भी विशेष परिस्थिति में ही मान्यता प्रदान की गई है।

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रत्येक भारतीय नागरिक को न्याय धर्म स्वतंत्र समता को प्राप्त करने के लिए उन्हें संवैधानिक मूल अधिकार प्रदान किए गए हैं क्योंकि ऐसे संवैधानिक मूल अधिकार प्रत्येक व्यक्ति एवं नागरिक की गरिमा एवं उसके चौमुखी विकास के लिए आवश्यक माना गया है तथा भारतीय नागरिकों में बंधुता बढ़ाने का संकल्प भी भारतीय संविधान में प्रदान किया गया है केवल प्रतिबंध राष्ट्र की एकता एवं अखंडता सुनिश्चित करने पर लगाया गया है इस विशेषण से यह स्पष्ट होता है एक ही भारतीय संविधान में धर्म जाति लिंग मूलवंश जन्म स्थान के आधार पर विभेद प्रतिबंध अनुच्छेद 15 में बनाया है लेकिन अनुच्छेद 15(3) द्वारा किसी जाति धर्म जाति वर्ग के विविध किए ही स्त्री और बालक समुदाय के लिए विशेष उपबंध बनाने से नहीं रोका गया है तथा अनुच्छेद 15(4) द्वारा ऐसी छूट राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े लोगों की उन्नति हेतु एवं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के विशेष उपबंध बनाने का राज्य को छूट दी गई है किंतु इसे रेवड़ियां बांटने के लिए नहीं बताया गया है तथा आधार केवल सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि को ही बनाया है लेकिन इसमें धर्म या जाति के आधार पर विभेद नहीं किया जा सकता है इसे मान्यता भी प्रदान नहीं की जा सकती है

उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि अनुच्छेद 16(3) एवं 16(4) में पिछड़े वर्गों को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से हो तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को लोक नियोजन में तभी मान्यता प्रदान की है जब उस राज्य में इन वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है इस प्रावधान में भी धर्म जाति को आधार नहीं बनाया जा सकता है

संविधान में जो पिछड़े वर्ग अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियां घोषित की गई है उसमें स्वतंत्रता से पूर्व की जातियों को ही आधार बना दिया है जब की स्वतंत्रता के बाद सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि में काफी परिवर्तन हो चुका है तथा अनेक जातियों का तो लोग नियोजन में भी पर्याप्त अधिक पत्नी होने के बावजूद उन्हें राज्य में विशेष लाभ प्रदान किया गया है जो संविधान अनुसार नहीं होना समझा जा सकता है तथा जब इस जाति को केवल हिंदू धर्म से जोड़ दिया गया है तथा इसमें धर्म को आधार बना देना भी किसी प्रकार से संविधान अनुसार नहीं माना जा सकता है क्योंकि भारतीय संविधान में स्त्री-पुरुष हिंदू मुस्लिम सिख इसाई पारसी जैन बौद्ध धर्म एवं ब्राह्मण वैश्य क्षत्रिय अन्य जनों के आधार पर भी विभेद नहीं किया जा सकता है

केवल स्वतंत्रता के बाद सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि पर ही लोग इन लोगों को अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग घोषित करने की समीक्षा करने की आवश्यकता है इसे धर्म जाति पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि पिछले 70 सालों में सामाजिक विभेद एवं शैक्षणिक स्तर जीन वर्गों में भर चुका है उन्हें तो केवल स्वतंत्र इमानदार निष्पक्ष संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा स्वच्छ मेधा प्रतियोगिता के आधार पर चयन किया जाना चाहिए ना कि जाति एवं धर्म के आधार पर आरक्षण प्रदान किया जावे।



डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त राय लेखक की निजी राय है। लेख में प्रदर्शित तथ्य और विचार से UPTRIBUNE.com सहमती नहीं रखता और न ही जिम्मेदार है
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